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गाँव से ही यह वृद्ध महिला कमा रही लाखों रुपए

 

मेहसाणा।(गुजरात)। मैं अपने पिता के घर से ही पशुपालन करती हूं। ससुराल में आयी तो यहां पर भी करती हूं, लेकिन तीन साल से मैं पशुपालन को व्यवसाय के रूप में शुरू किया है। इससे मेरी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है। ये वाक्य है 65 साल की नेनी चौधरी की जो नेशनल विज़न के साथ बात करते हुए बताती है। जो गुजरात राज्य की राजधानी गाँधीनगर से 100 किलोमीटर दूर महेसाणा जिले के विसनगर तालुका की रंगाकुई गांव की रहने वाली है। आज ये पशुपालन के दम पर महीने की 50 हजार रुपए कमा रही है। आज अपने गाँव की ही नही बल्कि पूरे जिले में महिलाओ के लिए उदाहरण बन रही हैं। कभी तीन से पाँच पशु इनके पास थे। लेकिन आज 20 से अधिक गाय है। इनसे रोज के 120 लीटर के आस पास दूध मिल जाता है।

इनके परिवार के लोग आज इनके इस कार्य पर गर्व महसूस करते है। वे कहते है कि आज घर में जो कुछ है वह इनके मेहनत के बदौलत है। धर्मेंद्र चौधरी कहते है कि ‘पशुपालन एक ऐसा व्यवसाय है, जो घाटे का सौदा नहीं दे सकता है’। पशु का चारा काटना हो या उनकी देख रेख खुद करती है। इन्होंने दूध निकालने के लिए मिल्किंग मशीन लगा रखी है। इन्हें दूध निकालने में मदद होती है। उन्होंने पशुओं को खूंटे में न बांधकर उसे खुले में रखती है और साथ ही लोहे की रेलिंग है। इसमें दूध देने वाली गाय एक तरफ दूध न देने वाली दूसरी तरफ रहते है, उनके बच्चे अलग रखे जाते है। जानवरो के भोजन जब करना होता है तो वह लोहे की रेलिंग से बाहर मुँह कर के भोजन कर लेते है।

इनके इस तरह के मॉडल को आज गाँव के और भी लोग अपना रहे है। ये कहती है कि’ खुले में जानवरों को रखने में यह फायदा है कि उनका दूध बढ़ता है’। आज ये तो खुद इस व्यवसाय से जुड़ी है साथ ही गाँव की ओर भी महिलाओ को इसमें जुड़ने के लिए प्रेरित कर रही है। यह वृद्ध महिला अपने इस उम्र में भी पशुपालन से अभी जुड़ी हुई है। जिसे देख और भी लोग कार्य रहे है।ये आगे कहती है कि ‘जब मैं पूरी तरह से इस व्यवसाय से जुड़ी नही थी तब बस खाने भर ही दूध होता था ।लेकिन तीन साल पहले मेरे बेटे ने राय दिया कि क्यों न हम इसे बड़ा करें।तब मुझें भी लगा की सही बात है जिसके बाद पशुपालन के क्षेत्र में मैं पूरी तरह लगी और आज मैं खुद अपने हाथ से भी दूध निकालती हूँ।

ये करने में मुझे कोई परेशानी नही होती क्योंकि पशुओं के साथ तो हमारा जन्म का रिश्ता है।ये हामरे जीवन के पूरक है।’ वहीं इनके बेटे कहते है कि ‘यह ऐसा व्यापार है जो घाटे का सौदा नही देता ।सात दिनों के अंदर इसका फायदा मिलने लगता है।अब तो हर गाँव में डेरी खुले हुए है,जिससे अब दूध बेचने के लिए बाहर जाने की जरूरत भी नही पड़ती है।’ आज गाँव की महिला अपनी योग्यता और काबलियत के दम पर लाखों रुपए कमा रही है। और जब 65 की उम्र की महिला जब यह उदाहरण पेश कर रही है।तो आप गांव की महिला किस सोच में पड़ी हैं आप भी निकलिए अपने घरों से और अपनी दृढ़ योग्यता और काबलियत के दम पर रचिए एक नया इतिहास।

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